साँची के स्तूप का इतिहास और उससे जुड़े रोचक तथ्य ।

साँची के स्तूप  का इतिहास : मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित है साँची का भव्य स्तूप है यह स्तूप भारत का राष्ट्रीय धरोहर तो है ही लेकिन खास बात यह है की साँची का स्तूप यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में भी शामिल है जो की हमारे देश के लिए  काफी गर्व की बात है । 


साँची का स्तूप एक बुद्ध परिसर है इसका सम्बन्ध महात्मा बुद्ध से सीधे तौर पर है,यह काफी विशाल है और अर्धगोलाकार अकार में बना हुआ है । इसके आसपास भी अन्य कई स्तूप छोटे है  लेकिन सभी  स्तूपों का एक केंद्र यह ही है। 

इस बुद्ध स्तूप को यूनस्को विश्व धरोहर सूची वर्ष 1989 शामिल किया गया ,साँची के स्तूप को बनाने की शुरुआत सम्राट अशोक द्वारा करवाई  गयी थी यह वही अशोक है जिनकी वजह से बुद्ध धर्म का काफी विस्तार हुआ।  

सांची के स्तूप को लगभग 13वीं शताब्‍दी के बाद कई वर्ष के लिए तो लोग इससे भूल ही गए थे लेकिन 1818 में जर्नल टेलर जो की एक ब्रिटिश अधिकारी थे उनके द्वारा पुनः खोज लिया गया। 

लगभग काफी दशको बाद में 1912 में सर जॉन मार्शल जो की एक पुरातत्विद और तात्कालिक पुरातत्‍व विभाग के महानिदेशक थे। उन्होंने  इस स्‍थल पर खुदाई के कार्य का आदेश दिया। 

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साँची के स्तूप की संरचना 

साँची में निर्मित यह स्तूप अर्धगोलाकार में है अन्य स्तूप भी लगभग इसी प्रकार से बने हुए है इसके हर भाग 
को अलग नामो के जरिये वर्गीकृत किया हुआ।  

स्तूप का आरम्भ एक अर्धगोलाकार लिए हुए मिट्टी के टीले से हुआ जिसे कुछ समय बाद अंड कहा जाने लगा ,धीरे इस टीले की संरचना पहले से ज्यादा जटिल हो गई इसे और आकर्षित बनाने के लिए इसमें गोल और चौकोर आकर के संतुलन बनाये गए।  

इस अर्धगोलाकार अंड के ठीक ऊपर एक आयातकार छज्जा बना हुआ है जिसे हर्मिका कहा जाता है इतिहास में इस छज्जे को देवी देवताओ के घर का प्रतीक माना गया है।  

इस स्तूप के सबसे अंत यानि ऊपर में यष्टि होता था जिसपे   छतरी के आकृति लगी होती थी और स्तूप चोरो और से वेदिकाओं से घिरा हुआ था , ये वेदिकाएं स्तूपों को सामान्य दुनिया से काट कर एक पवित्र स्थल बनाती है।  

सबसे रोचक बात जो लोगो इस स्तूप की ओर आकर्षित करती थी वह थी स्तूप के चारो ओर मौजूद तोरणद्वार 
जिसपे बेहद बारीकी और खूबसूरती से नक्काशी की गई थी। 

साँची के स्तूप से जुडी रोचक कहानी 


यह स्तूप इतने खूबसूरत की एशिया तो एशिया यूरोप के लोग भी इस स्तूप के दिवाने हो गए साँची के महास्तूप ने यूरोपियो को अपनी तरफ आकर्षित किया। 

साँची के स्तूप को कई बार नष्ट करने का भी प्रयास किया गया लेकिन इसके कुछ हिस्से काफी ठीक हालत में बच गए थे जिनमे से एक साँची के स्तूप का पूर्वी तोरणद्वार था , यह काफी अच्छी  स्थिति में था इसलिए इस पर फ्राँसियो की नज़र पड़ी , वो इससे फ्रांस के संग्राहलय में प्रदर्शित करने के लिए फ्रांस ले जाना चाहते थे।  

इसलिए उन्होंने शाहजहां बेगम से इसे फ्रांस ले जाने की इज़ाज़त मांगी इससे पहले ब्रिटिश भी यह प्रयास  कर चुके थे। 

लेकिन यह स्थान भोपाल राज्य को विरासत में मिला था इसके एक भी चीज से समझौता भोपाल राज्य के लिए काफी अन्याय साबित होता इसी कारण से अंग्रेजो और फ्रांसीसी को इसकी प्लास्टर प्रतिकृत्यों से संतुष्ट कर दिया गया यह काम बड़ी चालाकी के साथ किया गया था।  

कई लोगो ने इसे नष्ट करने का प्रयास किया वही दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी लोग थे जो की इस महान स्तूप के संरक्षण में लगे थे जिनमे प्रमुख थी भोपाल की शासक शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम थी।  उन्होंने इस खूबसूरत प्राचीन स्थल के संरक्षण के लिए धन का अनुदान किया। 

कई लोगो ने इसे नष्ट करने का प्रयास किया वही दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी लोग थे जो की इस महान स्तूप के संरक्षण में लगे थे जिनमे प्रमुख थी भोपाल की शासक शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम थी।  उन्होंने इस खूबसूरत प्राचीन स्थल के संरक्षण के लिए धन का अनुदान किया। 

आखिर स्तूप क्यों बनाये जाते थे ? 


दरसल स्तूप एक प्रकार के मिट्टी के टीलो को कहा जाता था जो की एक गोलार्ध पवित्र स्थल था , इसका सीधा सम्बन्ध बौद्ध धर्म से था।  इन स्तूपों के अंदर बुद्ध की अस्थियां और अवशेषो को गाड़ा गया था। इन स्तूपों में महात्मा बुद्ध के अवशेष मौजूद थे इसलिए इन्हे एक पवित्र स्थान माना गया इससे पहले भी कई स्तूप बने होंगे लेकिन सामान्यता स्तूप शब्द से महात्मा बुद्ध को जोड़ा जाता है।  

इन स्तूपों के निर्माण का सबसे बड़ा मकसद यही रहा होगा की इन स्तूपों को बुद्ध धर्म के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठा मिले। 


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